Apne Gharo Se Bahar Jane Se Darte Hai | Desh Kumar |
अपने घरों से बाहर जाने से डरते हैं है ज़माना की लोग ज़माने से डरते हैं.. मुस्कुराओ जो लोगों को देखकर वो पलटकर मुस्कुराने से डरते हैं.. डराता है मुझको तो शहरों का माहौल अक्सर यहां सब लोग मिलने मिलाने से डरते हैं.. मर गयी ख्वाहिशें बन गया इंसान मशीन सब मशीनों के इस कारखाने से डरते हैं.. मेरी ज़िम्मेदारियां मुझे खींच लाती हैं रोज़ वरना सचमुच हम ऑफिस जाने से डरते हैं.. ना लौटे कोई परिंदा गर शाम को वापिस उसके भूखे बच्चे चहचहाने से डरते हैं.. खून के रिश्ते भी ज़हर बन गये क्या? क्यों लोग अपने ही भाई को गले लगाने से डरते हैं.. ना जाने कौन किस नज़र से देखे गा मुझे इसलिये अब लोग पूरा नाम बताने से डरते हैं.. तिल तिल कर मर रहे हैं लोग यहां फिर जाने क्यूँ लोग मर जाने से डरते हैं.. -देश कुमार ___----___ Apne ghron se bahar jane se darte hai Hai zmana ki log zmane se darte hai.. Muskurao jo logo ko dekh kar Wo palatkar muskurane se darte hai.. Drata h mujhko to shahro ka mahol aksar Yha Sb log milne milane se darte hai.. Mar gyi khwahishe ban gya insaan machine Machino ke is kark...